6 Powerful Quotes from Shubha Didi’s Commentary on the Ashtavakra Gita

6 Powerful Quotes from Shubha Didi’s Commentary on the Ashtavakra Gita

जिसको भी आध्यात्म में रूची है उनके अंदर भी कई सवाल उठते होंगे।यही सारे सवालों का जवाब शुभा दीदी हमको अष्टावक्र गीता द्वारा दे रही है।दीदी अष्टावक्र गीता को सरल शब्दों में, खोल खोल कर समझाते है।आइये देखते हैं अष्टावक्र गीता की एक छोटी सी झलक जो हमने शुभा दीदी से सुनी है।

सूत्र - १

राजा जनक ने कहा, “हे प्रभु! ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मोक्ष कैसे होती है? और वैराग्य कैसे होता है? कृपा मुझे यह मुझे बताए।

राजा जनक के सवालों का जवाब देते हुए अष्टावक्र कहते है की ज्ञान का अर्थ है आत्मज्ञान जिसको जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता है। आत्मज्ञान के लिये वैराग्य का होना आती आवश्यक है।

सूत्र - २

अष्टावक्र ने कहा - हे प्रिये ! यदि तू मुक्ति की इच्छा रखते हो, है तात, तो इन्द्रियों के विषयों को विष के समान त्याग दो।क्षमा, सरलता, दया, संतोष और सत्य को अमृत के समान अपनाओ।

अष्टावक्र राजा जनक से कहते है अगर तुम मुक्ति चाहते हो विषयों को विष के समान त्याग कर और क्षमा, सरलता, दया, संतोष और सत्य को अपना सच्चा दोस्त बनालो । मन में अगर रस है, इच्छा वासना है तो इन्द्रिय हार जगह वास करेगी। हमे अपनी ऊर्जा को अपने आप को जानने के लिए उपयोग करना है।

सूत्र - ३

तू न पृथ्वी है, न जल है, न अग्नि है, न वायु है, न आकाश; मुक्ति के लिये अपने को इन सबके साक्षी के रूप में चैतन्य स्वरूप आत्मा को जानो।

अष्टावक्र अब सीधे राजा जनक को आत्मज्ञान ले जा रहे है। वे कहते है ना आप इन पाँच तत्वों से बने शरीर हो ना आपका कोई जाति वर्ण आदि है। वे समझते है की ना ही आप आँख आदि इंद्रियों का विषय हो। आप इन सबका साक्षी स्वरूप हो। यही आत्मा ज्ञान है जो मुक्ति का कारण है।

सूत्र - ४

अगर तुम शरीर से अलग होकर चेतना में विश्राम करते हो, तो अभी ही तुम सुखी, शांत और बंधनों से मुक्त हो जाओगे।

अष्टावक्र कहते है राजा जनक को की आप अपनी देह को अपने से अलग जान कर अपने स्वरूप आत्मा में जब स्तिथ हो जाओगे तो अभी ही आप शांत, सुखी और अपने को बंधन मुक्त पाओगे।

सूत्र - ५

तुम न ब्राह्मण आदि किसी वर्ण के हो, न किसी आश्रम के, न ही इंद्रियों के द्वारा ग्रहण किए जाने वाले हो। तुम असंग, निराकार, और विश्व के साक्षी हो। सुखी हो जाओ।

अष्टावक्र अब राजा जनक को और समझते है की वे क्या क्या नहीं है। वे बताते है किस प्रकार मनुष्य केवल ब्राह्मण या अन्य कोई वर्ण नहीं है, ना ही कोई आश्रम के है। मनुष्य वह है जो असंग है। वह निराकार का साकार रूप है और वह पूरे ब्रह्मांड का साक्षी होता है। यह बाथ सुनकर तथा जानकर राजा जनक की भाती हमे भी सारे दुखो को त्याग कर सुखी हो जाना है।

सूत्र - ६

धर्म और अधर्म, सुख और दुख सब मन के है, वे तुम्हारे नहीं है, हे सर्वव्यापी। तुम ना करता हो ना भोक्ता, तुम सदा ही मुक्त हो।

पिछले सूत्र की बाथ पर आगे बढ़ते हुए गुरु बताते है, पूरा संसार केवल मन के सीमित है। संसार का सारा धर्म, अधर्म, सुख और दुख केवल मन का ही है। यह सब मन में उत्पन्न होते है और मन में ही नाश हो जाते है। वे हमारे नहीं है। कोई ना कुछ करता है ना भोगता क्योंकि आत्मा में कोई बंदन नहीं है और इस करण हम सब सदा ही मुक्त थे, हे और रहेंगे।

अष्टावक्र गीता हर योगी के सवालों का उत्तर अपने अंदर समाये रखता है। ऊपर समझाए हुए ६ सूत्र गुरु शुभा

दीदी ने बड़े आसान शब्दों में समझाया है जीसे हम आज थोड़ा बहुत लिख कर आप सब तक पोहचाने

की कोशिश में है। गुरु माँ हमे केवल ग्रंथ पढ़ना नहीं, परंतु उसे अपने जीवन काल में किस प्रकार जीना है सिखाती है। अगर आपको भी इस माहा ग्रन्थ को जीना है तो आप हमारे IISHT GOLD मेम्बरशिप से जुड़ कर गीता का आनंद उठा सकते हो।