19 Powerful Karma Quotes from Śrimad Bhagvad Gita in Hindi
Chapter 2, 39
- हे पार्थ ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोगके विषय में कहीं गायी और अब तू इसको कर्मयोगके विषय में सुन - जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मो के बंधन कों भली भाँति त्याग देना अर्थात् सर्वथा नष्ट कर डालेगा। |39|
- हे अर्जुन! इस कर्म योग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किन्तु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्योंकी बुधियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं। |41|
Chapter 3, 1
- अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! यदि आपको कर्मकी अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्ममें क्यों लगते हैं? |1|
- मनुष्य न तो कर्मोका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताकों यानी योगनिष्ठाको प्राप्त होता है और न कर्मो के केवल त्याग मात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है। |4|
- निसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी कालमें क्षण मात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता; क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिये बाध्य किया जाता है। |5|
- जो मूंढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इंद्रियों को हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मन से उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है। |6|
- किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है कर्मयोग क, वही श्रेष्ठ है। |7|
- तू शास्त्र विहित कर्तव्य कर्म कर; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा। |8|
- यज्ञके निमित्त किये जानेवाले कर्मोंसे अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मोंसे बल बँधता है।इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञके निमित्त भी भली भाँति कर्तव्य कर्म कर। |9|
- परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करनेवाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।|17|
- उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मके न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है। तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थ का सम्बंध नहीं रहता। |18|
- इसलिये तू निरंतर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को भलीभाँति करता रह।क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। |19|
- जनकादि ज्ञानी जन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिये तथा लोक संग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है। |20|
- हे अर्जुन ! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्मों में ही बारतता हूँ। |22|
- क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते है। |23|
- इसलिये यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट भ्रष्ट हो जाए और मैं संकरताका करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ। |24|
- हे भरत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म करते है, आसक्ति रहित विद्वान् भी लोक संग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। |25|
- मूझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशा रहित, ममता रहित और संताप रहित होकर युद्ध कर। |30|
- जो कोई मनुष्य दोष दृष्टि से रहित और श्रद्धा युक्त होकर मेरी इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं। |31|